मध्यप्रदेश में अगली सरकार किसकी बनेगी

मध्यप्रदेश में अगली सरकार किसकी बनेगी, यह युवा मतदाता तय करेंगे। ढाई करोड़ से ज्यादा मतदाताओं की उम्र 40 साल से कम है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने शुक्रवार को विशेष पुनरीक्षण के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन कर दिया है। इसके मुताबिक प्रदेश में मतदाताओं की कुल संख्या 5 करोड़ 7 लाख 80 हजार 375 हो गई है। इसमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 2 करोड़ 65 लाख 78 हजार 270 और महिलाओं मतदाताओं की संख्या 2 करोड़ 42 लाख 788 हो गई है। थर्ड जेंडर मतदाताओं की संख्या 1 हजार 317 है।
प्रदेश में सबसे ज्यादा मतदाता संख्या वाली सीटों के हिसाब से देखा जाए तो इंदौर की विधानसभा सीट क्रमांक पांच में 3 लाख 80 हजार 107 मतदाता हैं। यहीं की इंदौर एक में 3 लाख 47 हजार 817, इंदौर दो में 3 लाख 37 हजार 953, भोपाल की गोविंदपुरा में 3 लाख 59 हजार 514, नरेला में 3 लाख 27 हजार 124 और हुजूर में मतदाताओें की संख्या 3 लाख 11 हजार 44 है।
ग्वालियर पूर्व में 3 लाख 4 हजार 84 मतदाता हैं। इसी तरह कम मतदाताओं के नजरिया से देखा जाए तो सबसे कम 1 लाख 52 हजार 886 मतदाता कोतमा विधानसभा में हैं। ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या दो से ढाई लाख के बीच निकली है।

छात्रों ने सवाल किया पढ़ाई में मन नहीं लग रहा क्या करूं

मैडम, मैं दमोह से अभिषेक बोल रहा हंू। मैंने पेपर में विज्ञापन देखा है कि बिना 10वीं-12वीं पास किए ग्रेजुएशन में प्रवेश लें। क्या यह सही है? ऐसा होता है क्या कि बिना बोर्ड परीक्षा दिए ग्रेजुएशन हो जाए? सोमवार को यह सवाल मप्र माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा छात्रों के लिए शुरू की गई हेल्पलाइन में पूछा गया। हेल्पलाइन शुरू होने के पहले ही दिन प्रदेशभर से करीब 400 कॉल आए।
बिना हाई स्कूल और हायर सेकंडरी परीक्षा पास किए ग्रेजुएश्ान के सवाल पर काउंसलर्स ने कहा कि यह भ्रामक विज्ञापन है। ऐसे विज्ञापनों के बहकावे में बिल्कुल ना आएं। छात्र से कहा गया कि वह अपनी बोर्ड परीक्षा के लिए मन लगाएं। इस तरह के विज्ञापन कॅरियर खराब कर सकते हैं। ये भोले-भाले छात्रों से पैसा ऐंठने का जरिया है।
काउंसलिंग में भोपाल के एक छात्र ने पूछा कि वह जो भी पढ़ता है भूल जाता है। कई बार पढ़ने में मन नहीं लगता। इसके लिए क्या करूं। काउंसलर ने उससे कहा कि पढ़ाई के समय वह कॉपी-पेन लेकर बैठे। जिस पॉइंट पर भी वह अटक रहा है उसे कॉपी में लिखे। इसके बाद उसे रिकॉल करे अगर फिर वह उसी पर अटक रहा है तो कॉपी देखे। इस प्रक्रिया को अगर वह दोहराएगा तो यह समस्या आसानी से दूर हो जाएगी।
कुछ छात्रों ने सवाल किया कि उन्हें परीक्षा से डर लगता है। घबराहट होती है कि पता नहीं पेपर कैसा आएगा? काउंसलर्स ने कहा कि वे अपनी पढ़ाई पर फोकस करें। इसकी चिंता बिल्कुल न करें कि पेपर कैसा आएगा। पेपर सिलेबस में से ही आएगा कहीं बाहर से बनकर नहीं आएगा, इसलिए पढ़ाई करें अच्छे नंबर आएंगे। छात्रों ने यह भी पूछा कि अच्छे नंबर लाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए ? काउंसलर्स ने कहा कि पेपर में जो पूछा गया है उसके मुताबिक उत्तर दें। लिखने पर ध्यान रखें इसी के साथ प्रश्न के मुताबिक शब्द सीमा भी देखें। जिन छात्रों को विषय संबंधित समस्या थी उन्हें विषय के शिक्षकों के नंबर भी दिए गए ताकि वे उनसे दिए गए समय पर सीधे बात कर सकें। काउंसलर्स ने बताया कि जैसे-जैसे परीक्षा का समय नजदीक आएगा कॉल करने वालों की संख्या भी बढ़ती जाएगी। गौरतलब है कि यहां तीन शिफ्टों में चार काउंसलर छात्रों-अभिभावकों की चिंता और समस्याओं का समाधान कर रहे हैं। यहां नीता तिवारी, शबनम खान आदि काउंसलिंग कर रही हैं।
ये मंत्र भी दिए
– हल्का भोजन लें, पर्याप्त नींद लें।
– परीक्षा से घबराएं नहीं पढ़ें, पेपर सिलेबस मे से ही आएगा।
– जहां अटकते हैं या कमजोर हैं, उसे कॉपी में लिखें।
– पढ़ने के बाद रिवीजन जरूर करें।
– प्रश्न के मुताबिक उत्तर लिखें, शब्द सीमा का ध्यान रखें।
– किताब से भी पढ़ें, कई बार प्रश्न पाठ के बीच में से भी पूछे जाते हैं।
– पढ़ाई के बीच थोड़ा अंतराल लें।

फीस सिस्टम से सरकार को सौ करोड़ की बचत

प्रदेश में सरकारी सिस्टम से फीस बंटवाई और सरकार को सौ करोड़ रुपए की बचत हो गई। पढ़ने-सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन यह सच है कि सरकारी सिस्टम से फीस बंटवाने पर उसे सौ करोड़ बच गए। पिछड़ा वर्ग कल्याण की पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति में ऐसा ही कुछ हुआ है। चालू वित्तीय वर्ष में पिछले साल की तुलना में करीब सौ करोड़ रुपए छात्रवृत्ति कम लगेगी। इसकी वजह छात्रवृत्ति या छात्रों की संख्या में कटौती नहीं, बल्कि तय नियम का पालन कराना है।
सरकार ने बस किया यह कि फीस नियामक आयोग ने जो फीस तय की थी, जिलों में उसकी केपिंग (तय फीस के हिसाब से छात्रवृत्ति तय) करा दी। इससे दस हजार रुपए की जगह जिन कॉलेजों को बीस से लेकर पचास हजार रुपए प्रति छात्र छात्रवृत्ति दी जा रही थी, वो पूरी तरह से बंद हो गई। इतना ही नहीं, आधा दर्जन से ज्यादा जिला अधिकारी गड़बड़ी करने के कारण मुश्किल में फंस गए हैं। अब नौबत आपराधिक प्रकरण बनने तक आ गई है।
पिछड़ा वर्ग के छात्र आर्थिक अभाव में उच्च शिक्षा से वंचित न रह जाएं, इसलिए सरकार ट्यूशन फीस छात्रवृत्ति के तौर पर देती है। पहले निजी कॉलेज वाले मनमर्जी से फीस वसूला करते थे, लेकिन फीस नियामक आयोग ने फीस तय कर दी। पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने 2013 में छात्रवृत्ति के नियम बना दिए। इसके हिसाब से कलेक्टर की अध्यक्षता वाली कमेटी को जिम्मेदारी सौंपी गई कि वो तय फीस के आधार पर छात्रवृत्ति तय करके दावा प्रस्तुत करे। पिछले तीन-चार साल में छात्रवृत्ति में हुए घोटालों को लेकर विभाग सतर्क हुआ और प्रदेशभर में 2014-15, 2015-16 और 2016-17 में दी गई छात्रवृत्ति की मुख्यालय से अधिकारियों के दल भेजकर जांच कराई।
इसमें खुलासा हुआ कि ट्यूशन फीस तय होने के बावजूद जिलों में तय छात्रवृत्ति से 10 से लेकर 30 हजार रुपए तक प्रति छात्र अतिरिक्त दे दिए। नौ जिलों की जांच में 14 हजार से ज्यादा छात्रों को 12 करोड़ रुपए ज्यादा देने के मामले सामने आ चुके हैं। जांच का सिलसिला अभी चल रहा है। उधर, विभाग को एक बड़ी कामयाबी यह मिली कि पिछले साल जहां 550 करोड़ रुपए की छात्रवृत्ति दी गई थी, वो चालू वित्तीय वर्ष में घटकर साढ़े चार सौ करोड़ रुपए के आसपास आ गई है।
विभाग के सचिव रमेश थेटे ने बताया कि जब हमे यह पता लगा कि जिलों में नियम के अनुसार छात्रवृत्ति नहीं बंट रही है तो हमने जांच कराने का फैसला किया। लेखों की जांच हुई तो गड़बड़ियां खुलने लगीं। दोषी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस देकर जवाब मांगे जा रहे हैं। संतुष्टि लायक जवाब नहीं होने पर आपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराए जाएंगे, क्योंकि ये खुली लूट है, जो मान्य नहीं है। सख्ती के चलते उम्मीद है कि छात्रवृत्ति वितरण में इस साल सरकार को करीब सौ करोड़ रुपए की बचत होगी। यह तब है जब छात्रों की संख्या बढ़कर साढ़े पांच लाख के आसपास हो गई है।
सूत्रों का कहना है कि जब जांच का सिलसिला शुरू हुआ तो जिलों से छात्रवृत्ति की मांग घटने लगी। कुछ जिलों ने तो बाकायदा लिखकर दे दिया कि हमारी मांग को तीन से लेकर पांच करोड़ रुपए तक घटा दिया जाए। इसके मायने यह हुए कि यदि सख्ती नहीं बरती जाती तो अधिक छात्रवृत्ति देने के नाम पर खजाने को लुटाने का जो खेल चल रहा था, वो चलता रहता। सूत्रों का कहना है कि छात्रवृत्ति वितरण में हुई गड़बड़ी के लिए कलेक्टरों की जिम्मेदारी भी बनेगी, क्योंकि वे जिला स्तरीय समिति के अध्यक्ष हैं।
यहां उजागर हो चुकी है गड़बड़ी
जिले–राशि
रीवा–3.21 करोड़
छिंदवाड़ा–2.76 करोड़
सतना–2.18 करोड़
कटनी–1.56 करोड़
बालाघाट–86 लाख
टीकमगढ़–43 लाख
गुना–42 लाख
मुरैना–35 लाख
बैतूल–26 लाख

2006 की पटवारी परीक्षा निरस्त कोर्ट ने अभी कोई फैसला नहीं दिया

साल 2006 में हुई पटवारी चयन परीक्षा का मामला अभी भी ग्वालियर हाईकोर्ट में चल रहा है। कोर्ट ने अभी कोई फैसला नहीं दिया लेकिन, राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव अस्र्ण पाण्डेय ने 2006 की पटवारी परीक्षा को निरस्त कर दिया है।
इतना ही नहीं इस परीक्षा में चयन हुए 77 पटवारियों पर एफआईआर के लिए श्योपुर प्रशासन को पत्र भेजा है। पीएस पाण्डेय ने चयनित पटवारियों पर एफआई का जिम्मा कलेक्टर पीएल सोलंकी व एसपी डॉ. शिवदयाल सिंह को दिया है।
गौरतलब है कि पटवारी परीक्षा का यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की सभी दलीलेें खारिज करते हुए दिसंबर 2014 में चयनित पटवारियों के पक्ष में फैसला देते हुए मप्र शासन को आदेश दिए थे कि वह पटवारियों को ज्वाइनिंग दें। लेकिन, राजस्व विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी चयनित उम्मीदवारों को ज्वाइनिंग नहीं दी।
दो साल तक भोपाल व श्योपुर के अफसर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे। इससे परेशान चयनित उम्मीदवारों ने कोर्ट की अवमानना की याचिका ग्वालियर हाईकोर्ट में लगा दी । ग्वालियर हाईकोर्ट में पिछले दो महीने में इस मामले में 5 तारीखें लग चुकी हैं।
इस मामले में अब 18 जनवरी की तारीख लगी है। यानी, हाईकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करवाने का मामला अभी विचाराधीन है लेकिन, राजस्व विभाग के पीएस अरुण पांडेय ने पिछले महीने इस मामले को अलग ही रुख दे दिया। श्री पांडेय ने सभी पटवारियों को पद से बर्खास्त करने के आदेश देकर उन पर एफआईआर के निर्देश दिए।
इस आदेश में तकनीकी खामी यह है कि, जब पटवारियों को अब तक ज्वाइन ही नहीं किया तो बर्खास्तगी कैसी? इस सवाल का जवाब कोई अफसर देना नहीं चाहता। अलबत्ता 15 दिसंबर को पीएस अरुण पांडेय ने 2006 पटवारी भर्ती परीक्षा को निरस्त कर दिया एवं आदेश श्योपुर भी भेज दिए। मंगलवार को श्री पांडेय का एक और पत्र श्योपुर कलेक्टर-एसपी के पास पहुंचा है जिनमं 77 पटवारी उम्मीदवारों पर एफआईआर कराने के आदेश हैं।
राजस्व विभाग ने जिन 77 पटवारी उम्मीदवारों पर एफआईआर का जिम्मा श्योपुर कलेक्टर-एसपी को सौंपा है उनमें से तीन की मौत हो चुकी है। लता शर्मा ने तो सदमें में फांसी लगा ली थी और नौकरी न मिलने के सदमें भी एक अन्य युवक मदन सोनी की जान चली गई थी। इतना ही नहीं कई युवाओं की संविदा शिक्षक के तौर पर नौकरी लग चुकी है। करीब 6 युवा ऐसे हैं जिन्होंने दोबारा 2013 में हुई पटवारी चयन परीक्षा पास की उसके बाद पटवारी की नौकरी ज्वाइन कर ली। यदि इन पर भी एफआईआर हुई तो इनकी नौकरी संकट में आ जाएगी।
पटवारी चयन भर्ती प्रक्रिया में शासन ने सबसे पहले अफसरों को दोषी माना था इसीलिए, साल 2008 में ही श्योपुर के तत्कालीन कलेक्टर सहित 14 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई थी। शासन के आदेश पर तत्कालीन कलेक्टर एमएस भिलाला, डिप्टी कलेक्टर कमलेश पुरी, एसएलआर हरफूल सिंह गुर्जर, जिला शिक्षा अधिकारी रामजीलाल उपाध्याय, एसएलआर एमपी बदरेंठिया, एमएल गुप्ता, नायब तहसीलदार रामदीन सेमिल, आरआई प्रभूलाल नारौलिया, काशीराम लखन, अशोक निर्मल, रघुवीर जाटव, मुश्ताक अहमद, पीएस धाकड़ और बलराम जाटव पर श्योपुर कोतवाली में कार्य के प्रति लापरवाही सहित कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जा चुका है।
चयनित पटवारियों की ओर से हरिओम गौतम व अन्य ने ग्वालियर हाईकोर्ट में मामला लगाया है। पिछली तीन तारीखों से हाईकोर्ट प्रमुख सचिव राजस्व का शपथ पत्र मांग रहा है लेकिन, सरकारी वकील कोई न कोई दलील देकर प्रमुख सचिव का शपथ पत्र अब तक पेश नहीं कर पाए हैं। गुरुवार को लगी तारीख में हाईकोर्ट न्यायाधीश ने सरकारी वकील को भी फटकारा क्योंकि, इस प्रकरण को लड़ने के लिए वकील ने अपना हलफनामा नहीं लगाया। पक्षकार हरिओम गौतम ने बताया कि 18 जनवरी को हाईकोर्ट ने पीएस अरुण पांडेय और श्योपुर कलेक्टर को कोर्ट में पेश होकर अपना पक्ष रखने के लिए कहा है।
राजस्व विभाग से 2006 के चयनित पटवारियों पर एफआईआर कराने के निर्देश मिले हैं। इस संबंध में पुराने रिकॉर्ड देखे जा रहे हैं। जल्द ही निर्देशों का पालन कराया जाएगा।

पुलिसकर्मियों की आत्महत्याओं की घटना से सरकार चिंतित

पुलिसकर्मियों की आत्महत्याओं की घटना से सरकार चिंतित है। लिहाजा इस मामले में पुलिस मुख्यालय ने एक अध्ययन कराया गया है। इसमें चौंकाने वाली बात सामने आई है कि करीब दो साल में मप्र पुलिस के 27 कर्मचारियों ने आत्महत्याएं कीं।
इनमें 20 साल की नौकरी पूरी करने वालों की संख्या आधे से ज्यादा है। वहीं पूरी नौकरी में बच्चों-परिवार के बारे में नहीं सोच पाने के तनाव में बीमारियों के कारण तो उनके भविष्य की चिंता में घुट-घुटकर पुलिसकर्मी खुदकुशी कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक पुलिस मुख्यालय ने एक जनवरी 2016 से 23 दिसंबर 2017 की अवधि में पुलिसकर्मियों द्वारा की गई आत्महत्याओं की घटनाओं का अध्ययन किया है। इसमें पाया गया है कि आत्महत्या करने वाले पांच पुलिसकर्मी वे थे जिनकी पांच साल से भी कम की सेवा थी। पांच से ज्यादा और 20 साल से कम सेवा पूरी करने वाले सात पुलिस वालों ने नशे की लत व बीमारी के कारण खुदकुशी की।
20 साल से ज्यादा सेवा करने के बाद 15 पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या कर जीवन समाप्त किया, जिसमें भिंड जिला पुलिस के टीआई से पीड़ित एक हवलदार भी शामिल है। इस अध्ययन में आत्महत्या के कारणों पर भी जानकारी जुटाई गई है। जिसमें पांच साल से कम सेवा करने वालों की खुदकुशी का कारण प्रेम प्रसंग या मनचाही लड़की से शादी नहीं करना भी पाया गया।
नशा व्यक्ति शौकिया करता है, लेकिन शराबी किसी तनाव को भूलने के लिए ही नशा करता है। तनाव से ही बीमारी होती है। पुलिसकर्मियों की आत्महत्याओं का मूल कारण तनाव ही है, जिसके कारण उन्हें नशे की लत पड़ी और बीमारी ने जकड़ लिया। इसलिए तनाव के कारणों को दूर करने का प्रयास होने चाहिए।

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एमबीबीएस सीटों के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के दिए सख्त निर्देश

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य शासन को एक सप्ताह के भीतर प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में मॉप-अप काउंसिलिंग राउंड में भरी गई एमबीबीएस सीटों के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट पेश करने सख्त निर्देश दिए हैं। इस रिपोर्ट में मॉप-अप काउंसिलिंग राउंड की 94 एमबीबीएस सीटों में दाखिला पाने वालों के अंक और मैरिट पोजीशन सहित प्रत्येक जानकारी शामिल करने कहा गया है।
मंगलवार को न्यायमूर्ति आरएस झा व जस्टिस नंदिता दुबे की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता खंडवा निवासी प्रांशु अग्रवाल और उज्जैन निवासी आदिश जैन सहित अन्य की ओर से अधिवक्ता आदित्य संघी खड़े हुए।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आरोप को गंभीरता से लेकर सरकार को यह भी साफ करने कहा है कि आखिर क्यों मूल निवासी योग्य छात्र-छात्राओं की उपलब्धता के बावजूद उन्हें दरकिनार किया गया? याचिकाओं में लगे एक-एक छात्र-छात्रा से एक-एक करोड़ लेकर एमबीबीएस सीट बेचे जाने संबंधी आरोपों के सिलसिले में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज और सरकार अपना जवाब प्रस्तुत करे।
उन्होंने दलील दी कि इस मामले में राज्य शासन का रवैया आश्चर्यजनक है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों पर एमबीबीएस सीटों पर गैर मूलनिवासी छात्र-छात्राओं को दाखिला दिए जाने के आरोप जैसे गंभीर मामले के बावजूद सरकार का रवैया कम दिखाने और ज्यादा छिपाने वाला बना हुआ है। जबकि कायदे से सरकार को खुलकर सभी तथ्य सामने लाने चाहिए। चूंकि ऐसा नहीं किया जा रहा है, अत: सवाल उठता है कि सरकार आखिर बचाव किसका कर रही है और क्यों?
अधिवक्ता आदित्य संघी ने आक्षेप लगाया कि 10 सितंबर 2017 की रात्रि मॉप-अप काउंसिलिंग राउंड में मध्यप्रदेश के मूलनिवासी वास्तविक योग्य छात्र-छात्राओं का हक सीधे तौर पर मारा गया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि याचिकाकर्ताओं सहित अन्य को 420 से अधिक अंक हासिल हुए थे, इसके बावजूद जिन्हें दाखिला दे दिया गया वे मध्यप्रदेश के गैर मूल निवासी होने के साथ-साथ महज 200 के आसपास अंक हासिल करने वाले अयोग्य छात्र-छात्रा थे। इससे साफ है कि मॉप-अप काउंसिलिंग राउंड के नाम पर करोड़ों रुपए लेकर एमबीबीएस सीटें बेचने का खुला खेल खेला गया।

पटरी में दो इंच का गैप इंदौर-भोपला इंटरसिटी ट्रेन को रोक लिया गया

लक्ष्मीबाई नगर और मांगलिया रेलवे स्टेशन के बीच पटरी में दो इंच का गैप आ गया। समय रहते इसकी जानकारी मिल जाने पर बड़ा हादसा टल गया। इसके बाद भोपाल और इंदौर के बीच चलने वाली ट्रेनें प्रभावित हो गईं। इंदौर-भोपला इंटरसिटी ट्रेन को रोक लिया गया। पटरी जिस जगह से क्रेक हुई वहां से ट्रेनों को 10 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से निकाला गया। इसके बाद रेलवे कर्मचारी पटरी को ठीक करने के काम में लग गए हैं।
जैसे ही रेलवे को पटरी में क्रेक की सूचना मिली, इस रूट की सभी ट्रेनों को रोक दिया गया। रेलवे कर्मचारियों ने देखा तो उसमें दो इंच का गैप था। इसके बाद ट्रेनों को कम रफ्तार में यहां से निकालने का फैसला लिया गया।

घायल बच्चों से मिले मुख्यमंत्री

सीएम साहब जिनके कलेजे के टुकड़े गए हैं, उन्हें पता है बच्चों के जाने का गम क्या होता है। आपके अधिकारी हंस रहे हैं। वे कहते हैं यह हादसा है। किसी बड़े व्यक्ति के बच्चे के साथ अनहोनी हो जाए तो पूरा इंदौर हिल जाएगा। हमारे बच्चों की मौत हुई है, इसलिए अफसर हादसा बता रहे हैं।
डीपीएस बस हादसे में मृत बच्चों के परिजन से रविवार को मिलने पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान पर हरमीत (खुशी) की मां जसप्रीत कौर (पम्मी) का गुस्सा कुछ इस तरह फूटा। मुख्यमंत्री जैसे ही ट्रेवल्स संचालक गुरजीतसिंह कुमार के घर (आर सेक्टर) पहुंचे, जसप्रीत फूट-फूटकर रोने लगीं। कुर्सी पर रखी हरमीत की तस्वीर को सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा वह स्कूल जाते-जाते दादा के हाथ से एक चम्मच चावल खाकर गई थी। अब कौन दादा-दादा बुलाएगा। यहां के टीचर जरा भी जिम्मेदार नहीं हैं। वे बच्चों के मारते थे। एक बार तो मैं खुद स्कूल गई। उस वक्त टीचर ने बच्ची को चांटा मार दिया था। मैं खुद बच्ची का स्कूल बदलने की कोशिश कर रही थी। अब जांच के नाम पर तमाशा चल रहा है। इससे मेरी खुशी वापस नहीं आ सकती। सिस्टम की लापरवाही सुनाते-सुनाते पम्मी सीएम को खरी-खोटी सुनाने लगीं। वह स्कूल-प्रशासन को कोस रही थी। सीएम असहाय होकर सुनते रहे।
मुख्यमंत्री एम सेक्टर में माइनिंग कंपनी के मैनेजर भोलेनाथ पांडे के घर पहुंचे। हादसे में मृत स्वस्तिक पंड्या को श्रद्धांजलि अर्पित कर मां मंजुला और बहन श्रेया को सांत्वना दी। वहां मौजूद विधायक उषा ठाकुर ने कहा यह बहादुर मां है। निजी स्कूल में टीचर है। रोजाना दूसरों के बच्चों को संभालती है। हाथ पकड़कर बस में बैठाती है। किसी का हाथ खिड़की में दिखाई दे जाए तो बस रुकवा देती है। हादसे में उसका ही बेटा चला गया। मंजुला के पति भुवनेश्वर (ओडिशा) में मैनेजर हैं। उन्होंने पति से फोन पर बात की और बेटे के अंग दान कर दिए। मासूम श्रेया ने मां को संभाला और कहा स्वस्तिक दूसरे बच्चे में जिंदा है। बड़ी होकर उसके नाम से एनजीओ चलाऊंगी।
मंजुला ने कहा मेरा बेटा तो चला गया। दूसरों के बच्चों को बचा लो। वहां मौजूद महिला शिक्षकों ने भी स्कूल और शिक्षा विभाग में फैली लापरवाही उजागर की। एक महिला ने कहा वह शिक्षक है। कई बातें करीब से देखती है, लेकिन उचित प्लेटफॉर्म न होने से शिकायत नहीं कर सकती। सरकार को हेल्पलाइन व ऐप बनाना चाहिए।
मुख्यमंत्री आईसीयू में बच्चों व परिजन से मिलने बॉम्बे अस्पताल पहुंचे। दस मिनट तक वे अस्पताल में रहे। उन्होंने डॉक्टर को अच्छे से इलाज करन के निर्देश दिए। वे परिजन से भी मिले। परिजन को उन्होंने ढांढस बंधाया और कहा कि संयम रखें।

पूर्व सांसद सुखलाल कुशवाहा की याद में लाठी रैली के बहाने नए सियासी गठबंधन का ऐलान

राजधानी में पूर्व सांसद सुखलाल कुशवाहा की याद में आयोजित लाठी रैली के बहाने नए सियासी गठबंधन का ऐलान किया गया। पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद यादव, पूर्व सांसद प्रकाश आंबेडकर और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने एक सुर में पिछड़े वर्ग के साथ दलित, मुस्लिम व आदिवासियों को एकजुट करने पर जोर दिया। शरद बोले-मोदी सरकार ने एक भी वायदा पूरा नहीं किया। 80 फीसदी वोट बिखरा हुआ है उन्हें एक कर सत्ता हासिल करें।
छोला मैदान पर आयोजित लाठी रैली में गैर भाजपाई दलों के पिछड़ा वर्ग और अजा-अजजा के नेताओं ने अगले विधानसभा चुनाव के लिए नए गठबंधन का संकल्प जताया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव के साथ पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व प्रदेश प्रभारी जुबेर खान भी खासतौर पर पहुंचे थे।
इस मौके पर शरद यादव ने कहा कि जाति को जमात बनाएं सत्ता अपने आप मिल जाएगी। भाजपा सरकार की आलोचना करते हुए बोले-ये लोग हिन्दू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद की बातें करते हैं। दंगा कराकर राज करना चाहते हैं। इन मुद्दों का सरकार से कोई वास्ता नहीं। पुणे की घटना में मराठा-दलित का झूठ फैला रहे हंै। संविधान और लोकतंत्र ने हमें वोट की ताकत दी है।
डॉ आंबेडकर ने तो कांग्रेस हाईकमान से सीधे आह्वान कर दिया कि अरुण यादव को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर दें। मप्र का अगला सीएम ओबीसी का ही हो। गुजरात में कांग्रेस ठीक से लड़ती तो भाजपा सत्ता में नहीं लौटती, हमारी लड़ाई बीजेपी से है। पैसे का खेल चल रहा गुजरात में एक वोट के लिए दस हजार रुपए बांटे गए। इसलिए संकल्प लें कि चुनाव में पिछड़े, दलित, मुस्लिम और अजजा को ही अपना वोट देंगे।
वह बोले कि यह सरकार दोबारा आई तो बात करने का अधिकार भी छीन लेगी। प्रजातांत्रिक समाज के लिए छोटी जातियों को सम्मान दें। धर्म की राजनीति बेकाबू हो रही है। उन्होंने हिंदूवादी संगठनों पर पुणे में हिंसा फैलाने का आरोप लगाया।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यादव ने कहा कि एकता ही सफलता का मूल मंत्र है। पिछड़े वर्ग के हम सभी साथी संगठित होकर काम करेंगे। जुबेर खान ने कहा कि सभी पिछड़ी जातियों को एकजुट करना है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं दीपक बाबरिया भी आने वाले थे लेकिन पहुंच नहीं पाए। रैली में कांग्रेस विधायक यादवेन्द्र सिंह, नीलांशु चतुर्वेदी एवं हिना कांवरे व राजमणि पटेल भी मौजूद थे।
पूर्व सांसद सुखलाल कुशवाहा के पुत्र सिद्धार्थ कुशवाहा ने रैली का आयोजन किया था। कार्यक्रम को जदयू के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोविंद यादव, महेन्द्र सिंह मौर्य, राजेश कुशवाह, सत्यशोधक समाज के सुनील सरदार और गुलजार सिंह मरकाम ने भी संबोधित किया। रैली में विंध्य, बुंदेलखंड,ग्वालियर और चंबल संभाग से हजारों लोग पहुंचे थे

व्यावसायिक परीक्षा मंडल नकल पर नकेल कसने के लिए लागू कर रहा नई व्यवस्था

परीक्षाओं में फर्जीवाड़े को लेकर सुर्खियों में रहने वाले व्यावसायिक परीक्षा मंडल (पीईबी) नकल पर नकेल कसने के लिए नई व्यवस्था लागू कर रहा है। इसके तहत आगामी परीक्षाओं में केंद्रों पर जैमर का प्रयोग किया जाएगा ताकि छात्र किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग नकल के लिए न कर सकें।
हाल में हुईं कुछ परीक्षाओं में अभ्यर्थी ब्लूटूथ सहित विभिन्न् प्रकार की डिवाइस लेकर नकल करते पकड़े गए थे। इसमें मोबाइल फोन भी शामिल हैं। मोबाइल फोन चालू अवस्था में मिलने पर उक्त अभ्यर्थियों के खिलाफ नकल का प्रकरण दर्ज किया गया और पुलिस में भी शिकायत की गई।
कुछ समय पूर्व ग्वालियर में पीईबी की परीक्षा में एक अभ्यर्थी बटन जितनी डिवाइस लेकर पहुंचा था। यह भी ब्लूटूथ डिवाइस थी। बताया जाता है कि उक्त अभ्यर्थी के ही किसी साथी ने परीक्षा के दौरान मुखबिरी की थी और वह पकड़ा गया। कई अन्य मामलों में भी इस प्रकार की डिवाइस मिली है जिसे आसानी से देखा नहीं जा सकता।
इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से नकल रोकने के लिए पीईबी परीक्षा केंद्रों पर जैमर लगाने की तैयारी कर रहा है। संविदा शिक्षक भर्ती परीक्षा में इसे लगाया जाएगा। इसी के साथ क्वालिटी कंट्रोल अधिकारी की परीक्षा में भी परीक्षा केंद्रों पर जैमर लगाए जाने का प्रस्ताव है। यह परीक्षा जबलपुर, ग्वालियर, भोपाल, इंदौर और सागर में होना है।
पीईबी के अधिकारियों ने बताया कि जैमर लगाने के लिए भारत सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है। जैमर लगने की वजह से कई बार परीक्षा केंद्र के आसपास के लोगों के मोबाइल भी काम नहीं करते। अगर क्वालिटी कंट्रोल परीक्षा में इसकी अनुमति 10-12 दिन पहले मिल जाती है तो जैमर का उपयोग करेंगे। इसके लिए जैमर लगाने वाली एजेंसी से भी चर्चा चल रही है। उसे भी इसे लगाने में समय चाहिए होता है। जैमर हैदराबाद से मंगवाने पड़ेंगे। अगर इस बार समय तो संविदा शिक्षक भर्ती परीक्षा में इसे लगाया जाना तय है। अधिकारियों ने बताया कि सत्यापन की अन्य व्यवस्था पूर्व की भांति यथावत रहेगी।
लगातार तकनीक में बदलाव आ रहा है। ऐसे ही नकल के मामले में भी है। नई-नई डिवाइस सामने आ रही हैं और कई बार नकल करते अभ्यर्थी पकड़ाए भी हैं। इस कारण परीक्षा केंद्रों में जैमर का उपयोग किया जाएगा। इसके लिए तैयारी शुरू कर दी गई है। संबंधित एजेंसी से भी चर्चा चल रही है।