नूडल्स और सॉफ्ट ड्रिंक के शौक ने इस बच्चें का किया ये हाल

फ़ास्ट फ़ूड खाने का किसको शौक नहीं है, बस कोई बहाना होना चाहिए। ये बात सबको पता है की फ़ास्ट फ़ूड हमारी सेहत के लिए कितना नुकसानदायक है। फिर भी हम उसको अवॉइड नहीं कर सकते है, क्योंकि हम उन चीज़ों को ज़्यादा अहमियत देते है जो हमें नुकसान पहुंचती है। ऐसे ही एक बच्चे के साथ हुआ.

जहां नूडल्स और कोला का ज्यादा सेवन करने से एक 10 साल के बच्चे का वजन 200 किलो हो गया। तेजी से वजन बढ़ने के कारण बच्चे की सर्जरी करानी पड़ी, हालांकि अन्य बच्चों के मुक़ाबले अभी भी उस बच्चे का वजन उम्र से कहीं ज्यादा है।

दरसल, इंडोनेशिया के रहने वाले 10 साल के आर्य मोसंत्री को खाने में नूडल्स, चावल और मछली ज्यादा पसंद थे। आर्य के माता-पिता पेशे से किसान हैं। उनका कहना है कि दिन भर खाते रहने के बावजूद आर्य मोसंत्री की भूख नहीं मिटती है। परिजन आर्य को डॉक्टर के पास ले गए, जहां डॉक्टर्स ने सलाह दी कि वो नूडल्स और मछ्ली, चावल का सेवन छोड़ दे। डॉक्टरों ने आर्य को कई स्वास्थ्य वर्धन दवाइयां दी, लेकिन फिर भी बच्चे के वजन में कोई बदलाव नहीं हुआ।

आखिर में डॉक्टरों ने आर्य मोसंत्री की सर्जरी की। सर्जरी के बाद भी आर्य का वजन 16 किलो ही कम हो सका। वहीं डॉक्टरों का दावा है कि सर्जरी कर आर्य के पेट का आकार करीब 85 फीसदी तक कम कर दिया गया है। आर्य की मां रकैया कहती हैं कि नाप के कपड़े नहीं मिलने की वजह से उनका बेटा स्कूल नहीं जा पा रहा है। वह घर के एक बाथटब में बैठा रहता है। उसके नाप के कपड़े भी नहीं हैं।

इस महिला बॉडीबिल्डर की ऐसी बॉडी देखकर सभी है हैरान

आपने कई बॉडीबिल्डर्स की फोटो आपने खूब देखी होगी लेकिन आज हम आपको महिला बॉडीबिल्डर की फोटो दिखाने जा रहे है जिसे देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। और शायद आप दातों तले उंगलियां दबा लें।आज ये फोटो सोशल साइट्स पर लगातार वायरल हो रही है। इनकी बॉडी ऐसी है कि अच्छे-अच्छों के होश उड़ जाएंगे। कई महिलाएं हैं जो घंटों जिम में बिताने के बाद ऐसी बॉडी बना रही हैं, जिससे आदमियों को भी शर्म आ जाए। इनकी बॉडी पर यकीन कर पाना काफी मुश्किल है। अब इस महिला को ही देख लीजिए। इनकी शक्ल देखकर कोई भी इनपर मर-मिटेगा। लेकिन इनकी बॉडी पर नजर पड़ते ही कोई इन्हें कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में एक महिला ने किया हुआ है डाक्टरों को हैरान

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में एक ऐसी महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिसके खून में हीमोग्लोबीन की मात्रा सिर्फ एक ग्राम डेसीलीटर है। इस महिला ने डाक्टरों को हैरान किया हुआ है ।
बांसवाड़ा जिले के घाटोल उपखण्ड क्षेत्र के आमलीवाटा गांव निवासी महिला देवा को दो दिन पहले महात्मा गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस महिला को बुखार था जो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अस्पताल में भर्ती होने के बाद जब महिला की जांच कराई गई तो हीमोग्लोबीन की इस मात्रा का पता लगा।
इस मामले की अस्पताल के लेब इन्चार्ज शरद त्रिवेदी ने भी पुष्टि की है। डाक्टर महिला की जांच रिपोर्ट देख कर अचरज में है।
लेब इन्चार्ज शरद त्रिवेदी के अनुसार सामान्य महिला का हीमोग्लोबिन 12 से 18 ग्राम प्रति डेसी लीटर होना चाहिए। आठ ग्राम से कम होने पर उसे एनिमिक माना जाता है। ऐसे में इतना कम हीमोग्लोबीन हैरान कर देने वाला है।

देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत भारत के कुछ प्रदेश अफ्रीका से भी बदतर

गोरखपुर हादसे ने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत सामने लाकर रख दी है। वैसे देखा जाए तो विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच ऐसी स्थिति कमोवेश हर साल बनती है। 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के आंकडे देखे जाए तो भारत के कुछ प्रदेश अफ्रीका से भी बदतर हैं। 2015 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर मिनट दो मासूम बच्चों की मौत होती है।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टेटिकल रिपोर्ट 2015 में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। बताया गया है कि उस साल भारत में पांच साल से कम उम्र के 10 लाख 8 हजार बच्चों की असमय मौत हुई थी। यानी 2959 मौतें हर दिन। इस हिसाब से हर मिनट दो बच्चों की जान जा रही है, जिसे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार कर बचाया जा सकता है।
– इंडिया अंडर-फाइव मॉर्टलिटी रेट (यू5एमआर) के तहत पांच से साल के कम उम्र के बच्चों पर रिपोर्ट तैयार की गई है। इसमें बताया गया है कि 2015 में जन्में हर हजार बच्चों में से 43 की मौत हो गई।
– 2015-16 में जहां देश की विकासदर 7.6 फीसदी रही, वहीं हर हजार बच्चों पर 43 की मौत का भारत का आंकड़ा ब्रिक्स देशों में सबसे खराब रहा। मध्यप्रदेश और असम जैसे प्रदेशों की स्थिति तो अफ्रीकी देश घाना से भी बदतर रही।
– वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकडों का हवाला देते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2016-17 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि इन मौतों का सबसे बड़ा कारण (53 फीसदी) नवजात शिशु संबंधी रहे।
– इसके बाद निमोनिया (15 फीसदी), डायरिया (12 फीसदी), मांसपेशियां (3 फीसदी) और चोट लगाना (3 फीसदी) कारण रहे।
– सरकार मानती है कि इनमें से 90 फीसदी बच्चों की मौत को बचाया जा सकता है, लेकिन अस्पतालों में सुविधाएं नहीं होने कारण ऐसा न हो सका।
– यूनिसेफ ने भी माना है कि भारत आर्थिक रूप से विकास कर रहा है, लेकिन बच्चों की मौत रोकने में नाकाम रहा है।

चॉकलेट के नियमित से दिमागी सेहत और समझ बढ़ती है

चॉकलेट के शौकीन लोगों के लिए अच्छी खबर है। ताजा शोध में पाया गया है कि नियमित रूप से चॉकलेट का सेवन दिमाग को फायदा पहुंचा सकता है। इससे दिमागी सेहत ठीक रहती है और समझ बढ़ती है।
इटली की लअकिला यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि कोको फ्लावानोल का अच्छा स्रोत है। फ्लावानोल ऐसा प्राकृतिक रसायन है जो दिमाग की सुरक्षा करता है। शोध में कोको के इस्तेमाल से प्रतिभागियों में याद रखने की क्षमता में निखार पाया गया।
पूरी रात नींद न ले पाने वाली महिलाओं में यह उन्हें लगातार जागते रहने के कारण होने वाले दुष्प्रभावों से बचाता है। फ्लावानोल से दिल को भी फायदा होता है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि चॉकलेट का ज्यादा प्रयोग अपने नुकसान भी साथ लाता है। हालांकि संभलकर सीमित मात्रा में किया गया सेवन दिल और दिमाग दोनों की हिफाजत कर सकता है।

इंसानों की उम्र की सीमा नहीं पता

इंसान कितने साल जिंदा रह सकते हैं? मनुष्य की अधिकतम उम्र क्या है? मॉन्ट्रियल के मैकगिल विश्वविद्यालय में बायोलॉजिस्ट्स इस सवाल का जवाब जानने के लिए अध्ययन कर रहे हैं। उनका कहना है कि इंसानों की उम्र की सीमा है, लेकिन कितनी यह वे पता नहीं कर सके हैं।
सिगफ्रेड हेकीमी ने कहा कि हमें नहीं पता कि उम्र की सही सीमा क्या हो सकती है। वास्तव में ट्रेंड लाइन को बढ़ाकर हम दिखा सकते हैं कि अधिकतम और औसत उम्र लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले अध्ययन ने 1968 के बाद हर साल यूएस, यूके, फ्रांस और जापान के सबसे अधिक समय तक जीवित रहने वाले व्यक्तियों की उम्र को देखा गया।
शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि अधिकतम मानव जीवनकाल करीब 115 वर्ष है। इस निष्कर्ष को बुधवार को नेचर जर्नल में प्रकाशित किया गया था।
हेकिमी ने कहा कि किसी ने यह नहीं दिखाया है कि मानव शरीर की कोई एक्सपायरी डेट है या उसके आंतरिक तंत्र थक सकते हैं। इस तरह की जैविक प्रक्रियाएं मौजूद हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ये जैविक प्रक्रियाएं एक घड़ी की तरह काम करती हैं। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वे 115 साल की उम्र के बाद नहीं जीवित रहेंगे।
औसत जीवनशैली बढ़ रही है। साल 1920 में कनाडा में रहने वाले व्यक्ति औसत 60 साल तक जीने की उम्मीद कर सकता था। साल 1980 में पैदा हुए कनाडा के लोग 76 साल तक जीने की उम्मीद कर सकते हैं और आज जीवन प्रत्याशा बढ़कर औसतन 82 साल हो गई है।

शराब लिवर पर कितना बुरा असर कर सकती है वीडियो सामने आया

हम सुनते, पढ़ते आए हैं कि शराब पीने से लिवर खराब हो जाता है। लेकिन यह हमारे लिए केवल एक टॉकिंग प्‍वांइट से बढ़कर नहीं होता। हमें इसका अंदाजा नहीं है कि शराब लिवर पर कितना बुरा असर कर सकती है। अब एक वीडियो सामने आया है जो आंखें खोलने के लिए काफी है।
अमेरिका के सेलिब्रिटी डॉक्‍टर ड्रियू पिन्‍सकी ने अपने सहयोगियों के साथ एक शो में यह दिखाया था। इसमें उन्‍होंने दो प्रकार के लिवर सामने रखे थे।
पहला, एक स्‍वस्‍थ व्‍यक्ति का स्‍वस्‍थ लिवर और दूसरा अल्‍कोहल से डेमेज्‍ड लिवर। दोनों के रंग रूप और हालत में बड़ा अंतर देखकर दीर्घा में बैठे दर्शक दंग रह गए। डॉक्‍टर ने बताया कि महिलाओं में अल्‍कोहल से होने वाला खतरा पुरुषों की तुलना में पांच गुना अधिक होता है।
किसी स्‍पंज की तरह नजर आने वाले लिवर को हाथ में थामकर और खराब वाले लिवर को देखकर डॉक्‍टर की सहयोगी भी आंसू छुपा नहीं सकी और उसे अल्‍कोहल के दुष्‍प्रभाव का स्‍पष्‍ट अंदाजा हो गया।
नॉर्मल लिवर :
– प्राकृतिक बनावट सही निकली
– रंग भी बदला नहीं था, वह हल्‍का महरून रंग का था
– केमिकल डक्‍ट ठीक थे
– आकार पतला और परफेक्‍ट था
डेमेज्‍ड लिवर :
– रंग उड़ा हुआ था, यह गहरा मटमैला हो चुका था, यानी सारी रक्‍त वाहिनियां नष्‍ट हो चुकी थीं
– अल्‍कोहल से पूरी तरह छलनी हो चुका था, इसके पूरे स्‍वरूप में छोटे बड़े छेद नजर आते हैं
– नष्‍ट होते डक्‍ट ने पुनर्निर्माण की कोशिश की लेकिन वे लिवर को खराब होने से नहीं बचा पाए
– नॉर्मल की तुलना में यह लिवर सूजा हुआ था
– जिस व्‍यक्ति के शरीर में यह था, उसका इम्‍यून सिस्‍टम बिगड़ चुका था

दुनिया की सबसे वजनी महिला इलाज के लिए अबूधाबी ले जाया जायेगा

दुनिया की सबसे वजनी महिला रहीं इमान अहमद को अब इलाज के लिए अबूधाबी ले जाया जा सकता है। इमान की बहन शाइमा सलीम और सैफी अस्पताल के डॉ. मुफज्जल लकड़वाला के बीच विवाद के बाद बुधवार को दुबई से डॉक्टरों का दल यहां आया है।
शाइमा ने वीडियो के जरिये कहा था कि डॉक्टरों ने इमान का वजन 500 किलो से 262 किलो होने का जो दावा किया है, वह झूठा है। अस्पताल ने उसके दावे को खारिज किया था।
शाइमा ने कहा, “मुझे किसी भी समय मुंबई छोड़ना पड़ सकता है। मैंने विशेषज्ञों को बुलाया है क्योंकि मैं अपनी बहन को ऐसे ही नहीं छोड़ सकती। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे ऐसा करना पड़ेगा। एक दिन पहले अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि वे नहीं बताएंगे कि उन्हें कब वापस भेजा जाएगा। इसके बाद मैंने डॉक्टरों को बुलाने का फैसला लिया। अगर जरूरत पड़ी तो मैं इमान को आगे के इलाज के लिए अबूधाबी ले जाऊंगी।”
अबूधाबी के वीपीएस हेल्थकेयर अस्पताल के चार डॉक्टरों और तीन अधिकारियों का दल सैफी अस्पताल आया है। उन्होंने इमान की रिपोर्ट देखी और डॉ. लकड़वाला के साथ बैठक की। इस बीच सैफी अस्पताल ने इमान की जांच के लिए स्वतंत्र टीम बनाई है।
लकड़वाला ने कहा कि 15 दिन पहले तक सब कुछ ठीक था। जब मैंने उससे (शाइमा) कहा कि इमान अब मिस्र के लिए विमान से जा सकती है तो वह भड़क गई। उसने धमकी दी कि अगर उन्हें नहीं रहने दिया जाएगा तो वह अस्पताल की छवि खराब कर देगी।

30 करोड़ से अधिक लोग डिप्रेशन से पीड़ित

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया में 30 करोड़ से अधिक लोग डिप्रेशन (अवसाद) से पीड़ित हैं। साल 2005 से 2015 के बीच इस तरह के मामलों में 18 फीसद से अधिक की वृद्धि हुई है। साल 2015 में 56 लाख भारतीय अवसाद से पीड़ित थे, जो देश की कुल आबादी का 4.5 फीसद है।
इस बीमारी के बारे में लोगों को शिक्षित करने और लोगों को इससे जुड़े मिथकों के बारे में भी जागरुक करने की तत्काल जरूरत है। जानते हैं इसके बारे में…
डिप्रेशन सिर्फ मायूस होना है
अवसाद की पहली और मुख्य विशेषताओं में से मायूसी की भावना का होना है। मगर, यही एक कारण डिप्रेशन के लिए जिम्मेदार नहीं है। अक्सर, अचानक हानि या परेशान होने की वजह से मायूसी होती है, जबकि डिप्रेशन एक पुरानी मानसिक बीमारी है। अवसाद से ग्रसित व्यक्ति चिंता, उदासी, उदासीनता, अकेलापन और शून्यता की भावना जैसी कई नकारात्मक भावनाओं को महसूस करता है।
डिप्रेशन की शुरुआत के पीछे एक व्यक्तिगत कारण होता है
डिप्रेशन एक मानसिक बीमारी है, जो एक व्यक्तिगत हानि या दर्दनाक घटना से जुड़ी हो सकती है या नहीं भी हो सकती है। कई बार अत्यधिक तनाव, कुछ मेडिकल कंडीशन या एक निर्धारित दवा के साइड इफेक्ट के कारण भी डिप्रेशन हो सकता है। यह एक मानसिक स्थिति है जो गंभीरता से बढ़ती है और जिसे तत्काल चिकित्सा और चिकित्सीय देखभाल की जरूरत होती है।
ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण है और सामान्य जीवन नहीं जी सकता
यह धारणा पूरी तरह से गलत है और यही एक बड़ा कारण है कि डिप्रेशन का सामना कर रहे लोग कलंकित होने के डर के लिए चिकित्सकीय सहायता नहीं लेते हैं। डिप्रेशन एक मानसिक स्थिति है और इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति “पागल” है। इससे पीड़ित व्यक्ति अपने परिवार और दोस्तों की मदद से निश्चिततौर पर एक सामान्य जीवन जी सकते हैं। थेरेपी और मनोरोग परामर्श उनकी समस्याओं को पहचानने और उससे निपटने में मदद कर सकते हैं। एक मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति के विपरीत डिप्रेशन की समस्या से जूझ रहा व्यक्ति मामूली चिकित्सा सहायता के साथ पूरी तरह से सामान्य और स्वतंत्र जीवन जी सकता है।
खुश हो जाओ, यह सब मन में है
अवसाद से पीड़ित व्यक्ति को अक्सर अत्यधिक संवेदनशीन होने के कारण दोषी ठहराया जाता है। लोग यह देखने में विफल रहते हैं, वह डिप्रेशन का सामना कर रहा व्यक्ति कैसे प्रभावित महसूस कर रहा है। असंवेदनशील बातें कहने जैसे अपनी भड़ास को निकालो या खुश रहो कहने के बजाय सहायक और सहानुभूति देना बहुत महत्वपूर्ण है। मरीज को दोष देने से यह समस्या और खराब हो सकती है और आत्महत्या करने के विचारों को बल दे सकती है।
निराश लोग आपका ध्यान चाहते हैं
अवसादग्रस्त व्यक्ति वास्तव में लोगों का ध्यान नहीं खींचना चाहता है। वे चाहते हैं कि लोग उन्हें अकेला छोड़ दें और और वे एकांत में रहना चाहते हैं। आप अक्सर उन्हें यह कहते हुए सुनेंगे कि वे सब लोगों को छोड़कर भाग जाना चाहते हैं। इसलिए अगली बार जब कोई व्यक्ति अवसादग्रस्त व्यक्ति ऐसी बातें कहे, तो उससे यह नहीं कहें कि वह ऐसा लोगों का ध्यान खींचने के लिए कर रहा है।
निराशा से पीड़ित व्यक्ति को परिवार और दोस्तों से बहुत मदद और उसे समझने की जरूरत होती है। ऐसे दुखों को समझना मुश्किल है क्योंकि यह शारीरिक नहीं, मानसिक होती है। इस समस्या से जूझ रहे लोगों के साथा हमदर्दी रखने और उनके प्रति सहानुभूति रखने की जरूरत होती है।

रुकिए ! अपनी आदतों पर गौर कीजिये कही आप सेहत बनाने की बजाय बिगाड़ तो नहीं रहे … टूट जायेंगे आपके ये भ्रम

यूं तो लोग अपने खाने के मैन्यू का बेहद ख्याल रखते हैं। अच्छी सेहत और फिट रहने के लिए जिम, डाइटिंग और योगा करते हैं। लेकिन अमूमन खाने के बाद की गई कुछ गलत आदतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। जिससे हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। सही जानकारी ना होने के कारण इन आदतों से आपके शरीर को काफी नुकसान पहुंचता है। जितना जरूरी अच्छा भोजन करना है, उतना ही पोषक तत्वों का शरीर को लगना और खाने का सही तरह से पाचन है। अनजाने में की गई तमाम गलतियों का असर स्वास्थ्य पर पड़ता है। जो दबे पांव कई बीमारियों को साथ लाता है।
तो आइए जानते हैं कुछ ऐसी आदतें जो आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं:
खाते समय पानी को कहें ना
कभी भी खाना खाते वक्त और खाने के तुरंत बाद पानी ना पिएं। अगर आप खाने के दौरान या बाद में पानी पीते हैं, तो अपनी आदत तुरंत बदलें। ऐसा करने से पाचन तंत्र कमजोर होता है और कब्ज की शिकायत संभव है। सही मायनों में, खाने से आधा घंटे पहले और खाने के एक घंटे बाद ही पानी पीना चाहिए। ध्यान रखें कि खाने से तुरंत पहले भी पानी पीने से पाचन शक्ति कमजोर होती है।
खाने के बाद आराम को कहें बाय-बाय
अक्सर लोग ओवरईटिंग के शिकार होने के बाद लेट जाते हैं, आराम फरमाते हैं। लेकिन मालूम हो यह आदत आपके शरीर को बहुत नुकसान पहुंचा सकती है। क्योंकि भोजन को पचने में समय लगता है, ऐसे में खाने के तुरंत बाद बिल्कुल नहीं सोएं। इससे आपकी पाचन क्रिया पर गलत प्रभाव पड़ता है, साथ ही मोटापा भी बढ़ता है।
खाने के बाद नहाने को नो-नो
कुछ लोगों की आदत होती है खाने के बाद नहाने की। अगर आप भी ऐसा करने वालों में शामिल हैं तो सावधान हो जाएं। क्योंकि खाने के बाद खून का संचार पेट की तरफ ज्यादा होता है। ऐसे में नहाने पर शरीर का तापमान तुरंत बदल जाता है। हाथों-पैरों में खून का प्रवाह बढ़ता है और पेट के आसपास रक्त प्रवाह कम हो जाता है। लगातार ऐसा करने से आपका पाचन तंत्र कमजोर पड़ सकता है।
चाय और कॉफी पर ब्रेक लगाएं
कई लोगों को खाने के बाद चाय, कॉफी पीना बेहद पसंद होता है। अगर यह आपकी भी आदत में शुमार है तो तुरंत इसे बदलें। खाने के बाद चाय पीना शरीर के लिए बहुत ज्यादा हानिकारक है। चाय शरीर में खाने के द्वारा लिए गए पोषक तत्वों को खत्म करता है। वहीं कॉफी में कैफीन होता है, जो आयरन खत्म करता है। खाने के तुरंत बाद चाय, कॉफी पीने से खाने को पचने में परेशानी होती है। इसलिए, कोशिश करें कि खाने के एक घंटे तक चाय की चुस्की पर ब्रेक लगाएं।
खाने के बाद तुरंत ना टहलें
लोगों में मिथ्या है कि खाने के बाद टहलना सेहत के लिहाज से फायदेमंद है। इसलिए लोग फैट घटाने और भोजन पचाने की एवज में मीलों वॉक के लिए निकल पड़ते हैं। लेकिन जरा संभलकर… खाने के तुरंत बाद वॉक करने से पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। क्योंकि शरीर को खाने के पोषक तत्व लेने में समय लगता है। टहलना ही है तो खाने के आधे घंटे बाद जाएं। लंच के बाद आराम करें और डिनर के आधे घंटे बाद हल्की सी वॉक पर निकलें। वॉक के समय तेज गति से चलने की बजाय धीरे-धीरे घूमें। साथ ही 20 मिनट से ज्यादा ना टहलें।
खाने के तुरंत बाद ना खाएं फल
अमूमन सभी घरों में खाने के बाद कुछ मीठा खाने का चलन है। मीठा खाने के लिए लोग फलों का सेवन बेहतर मानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कभी भी खाने के तुरंत बाद फल नहीं खाने चाहिए। खाने के बाद शरीर को खाना पचाने में समय लगता है। अगर इसी दौरान आप फल भी खा लेते हैं तो वो पेट में ही चिपक जाते हैं। फिर ना तो फल और ना भोजन के पोषक तत्व शरीर को मिलते हैं। इसलिए या तो खाने से दो घंटे पहले फल खाएं या खाने के दो घंटे बाद। सबसे बेहतर है सुबह के समय खाली पेट फल खाना।
खाने के बाद सिगरेट से करें तौबा
सिगरेट पीना वैसे तो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ही। कुछ लोगों का खाना तब तक नहीं पचता जब तक वह सिगरेट ना सुलगा लें। अगर आप भी इस फेहरिस्त में शामिल हैं तो जान लें कि खाने के तुरंत बाद धूम्रपान दस गुना ज्यादा खतरनाक होता है। मतलब खाने के बाद एक सिगरेट पीना दस सिगरेट के बराबर है। जिससे पाचन क्रिया, किडनी, दिल और फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा कैंसर का खतरा भी बढ़ता है, एसिडिटी और गैस्ट्रिक की परेशानी हो सकती है।
ब्रश कीजिए लेकिन ज़रा रुककर
बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि दिन में दो बार ब्रश जरूर करना चाहिए। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि खाने के तुरंत बाद ब्रश करना बिल्कुल सही नहीं है। इसलिए हमेशा खाने के कुछ देर बाद ब्रश करें। अगर खाने में खट्टी चीज खाई हो, तो तुरंत ब्रश करने से दांतों की ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है।