उत्तर कोरिया की ओर से एक और बैलिस्‍टिक मिसाइल लॉन्च की तैयारियों के संकेत

उत्तर कोरिया की ओर से एक और बैलिस्‍टिक मिसाइल लॉन्च की तैयारियों के संकेत जापान को मिले हैं।
जापान के सरकारी सूत्रों ने मंगलवार को बताया, जापान को कुछ रेडियो सिग्‍नल प्राप्‍त हुए हैं जो उत्तर कोरिया द्वारा एक और बैलिस्‍टिक मिसाइल परीक्षण की संभावना की पुष्‍टि कर रहे हैं। हालांकि ये सिग्‍नल आम नहीं हैं और सैटेलाइट इमेज से किसी नई गतिविधि का पता नहीं चल रहा है।
अप्रैल से एक माह में दो या तीन मिसाइलों की फायरिंग के बाद सितंबर में उत्तर कोरियाई मिसाइल लांचिंग रुक गयी जब प्‍योंगयांग द्वारा फायर किया गया रॉकेट जापान के उत्तरी होक्‍काइदो आइलैंड के ऊपर से गुजरा था।
जापान की क्‍योदो न्‍यूज एजेंसी के अनुसार, रेडियो सिग्‍नल मिलते ही जापान सरकार अलर्ट हो गयी। इन रेडियो सिग्‍नल के अनुसार जल्‍द ही लांच होने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार, ये सिग्‍नल उत्तर कोरियाई मिलिट्री द्वारा विंटर मिलिट्री ट्रेनिंग से संबंधित भी हो सकता है।
दक्षिण कोरिया के न्‍यूज एजेंसी ने दक्षिण कोरिया के सरकारी सूत्रों का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिका, दक्षिण कोरिया व जापान को भी संभावित मिसाइल लॉन्च के संकेत मिले हैं।

12वीं विज्ञान के एक छात्र ने कमरे में फांसी लगाकर कर ली आत्महत्या

राजकोट में दोस्त के बाद नहीं करने से दुःखी 12वीं विज्ञान के एक छात्र ने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस को हॉस्टल के कमरे में एक सुसाइड नोट मिला है, जिसमें इस बात का उल्लेख किया गया है।
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, मूला मोरबी तहसील के वाघपर पिलुडी गांव का निवासी छात्र जैनिक सुराणी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। उसके पिता अरविंद भाई दूसरों के खेत में मजदूरी करते हैं। जैनिक टंकारा स्थित आर्यम विद्यालय नामक निजी स्कूल के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करता था। दोस्तों के मुताबिक, वह बहुत भावुक व जज्बाती स्वभाव का लड़का था।
जानकारी के मुताबिक, रविवार को जब स्कूल के सहपाठी मैच खेलने के लिए जैनिक को बुलाने गए तो उसका शव कमरे में पंखे से लटक रहा था। स्कूल संचालकों ने इस बारे में तुंरत ही पुलिस को सूचना दी।
बताया जा रहा है कि फांसी लगाने से पहले जैनिक ने एक सुसाइड नोट लिखी थी, जो उसके कमरे से बरामद की गई है। सुसाइड नोट में उसने लिखा है कि शुक्रवार को किसी बात को लेकर उसकी अपने दोस्त से अनबन हुई थी और इस वजह से ही वो उससे बात नहीं कर रहा था। इसकी वजह से वह काफी दुखी था और उसने आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठा लिया।
छात्र के आत्महत्या करने की खबर से स्कूल कैम्पस में सनसनी मच गई। फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है।

60 बच्चे नक्सली बन गए मप्र के हालात समझने की कोशिश

माओवादियों को खबरें पहुंचाने के शक में पुलिस की क्रूरता का शिकार हुई छत्तीसगढ़ की सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी कहती हैं कि नक्सलवाद से लड़ाई संभव है पर सरकारी नीतियों से कैसे लड़ें? वे कहती हैं छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में नक्सलवाद सरकार की ही देन है। सरकारें इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं होने देना चाहती हैं, क्योंकि नक्सलवाद के नाम पर पैसा मिलता है और राजनीति भी इसी से चलती है।
भोपाल जन उत्सव में राजधानी आईं सोरी ने ‘नवदुनिया’ से विशेष बातचीत में कहा कि छत्तीसगढ़ में सरकार की नीतियां पुलिस को जनता पर अत्याचार करने के लिए मजबूर कर रही हैं। पुलिसकर्मी दिन-रात जंगलों में गश्त करते हैं। गश्त के दौरान कोई घटना न हो तो उनके अफसर नहीं मानते कि गश्त हुई है। बोला जाता है किसी को पकड़कर क्यों नहीं लाए। उन्हें बुरा-भला बोला जाता है। इसलिए वे आदिवासियों को माओवादी बताकर ड्यूटी निभाते हैं।
सोरी कहती हैं नक्सलवाद से निपटना मुश्किल नहीं है। इसके लिए जमीनी लोगों को जोड़ना पड़ेगा। जबकि वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार के अफसर चैंबर में बैठकर इस समस्या से निपटने की योजना बना लेते हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचलों में राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। पुलिस का अत्याचार बढ़ गया है। इससे दुखी लोग नक्सली बन जाते हैं।
वे सवाल खड़ा करती हैं कि इस समस्या का हल सरकार के हाथ में नहीं है। कहा जाता है कि नक्सली काम नहीं करने दे रहे तो सरकार ही बताए कि आज तक नक्सलियों ने बड़ी परियोजनाओं को नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया। सत्ता पक्ष के लोगों पर हमला क्यों नहीं किया? वे गुनहगारों को फांसी देने के पक्ष में नहीं हैं।
सोरी ने कहा कि मेरे ऊपर हुए अत्याचार का मुझे दुख नहीं है। दुख इस बात का है कि जिन 60 अनाथ बच्चों को मैं नौ साल पहले पढ़ाने के लिए जंगलों से लाई थी। मेरे जेल जाने के बाद वे नक्सली बन गए। उन्होंने एक बार अपने माता-पिता पर अत्याचार देखा था और फिर मुझ पर।
सोरी आदिवासी कल्याण संस्थाओं पर टिप्पणी करती हैं कि ऐसी संस्थाएं भी हक नहीं दिला पा रही हैं। बस पैसे की बंदरबाट की जा रही है। वे कहती हैं कि आदिवासी और महिलाओं के हक के लिए मैं हमेशा लड़ती रहूंगी। मप्र के हालातों को भी समझने की कोशिश कर रही हूं।