जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने नया चुनाव कराने से किया इन्कार

जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने नया चुनाव कराने से इन्कार किया है। उन्होंने कहा कि वह जल्द ही नई सरकार का गठन करना चाहती हैं।
न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, मर्केल ने कहा कि वह नहीं चाहतीं कि चुनाव नतीजे को लेकर अगर हम कुछ नहीं कर सके तो लोगों से फिर मतदान के लिए कहा जाए।
उन्होंने कहा कि जर्मनी में एक स्थिर सरकार होनी चाहिए। वह शनिवार को अपनी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन के सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं।
12 साल से सत्ता संभालने वाली मर्केल को सबसे गंभीर राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि 24 सितंबर को हुए संघीय चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला।
19 नवंबर को सरकार गठन को लेकर फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी और ग्रीन्स के साथ उनकी बातचीत विफल हो गई थी। जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रैंक-वाल्टर स्टीनमियर ने मर्केल, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता मार्टिन शुल्ज और बेवेरियन
क्रिश्चियन सोशल यूनियन के नेता हॉर्स्ट सीहोफर को महागठबंधन बनाने को लेकर चर्चा के लिए अगले सप्ताह बुलाया है।

देशभर में सैकड़ों गांव-कस्बे नाना और नानी के नाम पर

“मुहल्ले की वो सबसे निशानी पुरानी वो बुढ़िया जिसे लोग कहते थे नानी वो नानी की बातों में परियों का डेरा वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा।” सुदर्शन फाकिर द्वारा लिखीं ये पंक्तियां जगजीत सिंह की मधुर आवाज पाकर अमर हो गईं। इस गीत को गुनगुनाते ही शहर से कोसों दूर गांव में नानी के साथ बिताए पलों की याद हमें अपने बचपन में ले जाती है, लेकिन हमारे बच्चे इस स्नेह भरे रिश्ते से दूर जा रहे हैं।
सिर्फ नानी ही क्यों, नाना, दादा-दादी, मामा-मामी, चाचा-चाची जैसे तमाम रिश्ते बस्तों के बोझ तले दब रहे हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देशभर में सैकड़ों ऐसे गांव-कस्बे हैं, जहां से इन रिश्तों की खुशबू आती है। इनमें सबसे ज्यादा गांव-कस्बे नाना और नानी के नाम पर हैं। 200 गांव-कस्बों के नाम के आगे या पीछे नाना या नानी जुड़ा हुआ है। जितने नाना उतने नानी।
जिस गुजरात में मोटा भाई सबसे ज्यादा बोला जाता है, वहां 91 गांव-कस्बे नानी और 82 नाना के नाम पर हैं। इसके बाद हिमाचल प्रदेश में चार, राजस्थान में दो, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में एक-एक गांव नाना के नाम पर हैं। नानी के नाम पर हिमाचल प्रदेश में एक, राजस्थान में छह, मध्य प्रदेश में चार गांव हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में एक भी नहीं। दादा-दादी के नाम पर सिर्फ 30 गांव हैं। इनमें से 16 दादा और 14 दादी के नाम पर हैं।
दादा के नाम पर सबसे ज्यादा चार-चार गांव हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में हैं, वहीं उत्तराखंड में तीन, राजस्थान और अरुणाचल प्रदेश में दो-दो व पंजाब में एक गांव है। दादी की बात करें तो सबसे ज्यादा छह गांव या कस्बे मध्य प्रदेश में हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में चार, ओडिशा, जम्मू कश्मीर, राजस्थान और अरुणाचल प्रदेश में एक-एक है। इसके अलावा काका-काकी के नाम पर भी अलग-अलग राज्यों में 11 गांव हैं।
भैया और दोस्त बनाने में उत्तर प्रदेश वाले पीछे नहीं हैं। देशभर में 21 गांव या कस्बे के नाम में भैया शब्द जुड़ा हुआ है। इनमें से अकेले 13 गांव उत्तर प्रदेश में हैं। इसके अलावा बिहार व राजस्थान में तीन-तीन और पश्चिम बंगाल में दो गांव भैया के नाम पर हैं। दोस्त के नाम पर 15 गांवों में से 11 उत्तर प्रदेश और चार बिहार में हैं। भाई के नाम पर 30 गांवों में से अकेले 10 पंजाब में हैं। भाभी के नाम पर भी दो गांव हैं, एक उत्तर प्रदेश में तो दूसरा बिहार में।
दुनिया के सबसे पवित्र रिश्ते यानी मां के नाम पर देश में कोई गांव या कस्बा नहीं है। जबकि, बहन के नाम पर आठ, पिता के नाम पर छह, मामा के नाम पर तीन और एक गांव मामी के नाम पर है।

व्यापमं घोटाले में शातिर आरोपियों के साथ कई निर्दोष भी चपेट में

बहुचर्चित व्यापमं घोटाले में शातिर आरोपियों के साथ कई निर्दोष भी चपेट में आ गए। एसटीएफ ने बगैर कोई पुख्ता सबूत या जांच के उन्हें सिर्फ इसलिए आरोपी बना दिया, क्योंकि वे संदिग्ध परिस्थिति के घेरे में आ रहे थे। बाद में एसटीएफ उनके खिलाफ सबूत जुटा भी नहीं पाई। ऐसे ही 27 आरोपियों को सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में क्लीनचिट दे दी है।
विशेष न्यायधीश डीपी मिश्र की अदालत में पेश की गई चार्जशीट में सीबीआई ने सबूत नहीं होने, आवेदक के निर्दोष होने के पूरे प्रमाण होने, जांच से पहले ही मौत होने या ऐसे साक्ष्य जो कोर्ट में जिरह के दौरान टिक नहीं पाएंगे, के आधार पर 27 लोगों को निर्दोष बताया है।
एसटीएफ द्वारा दीपा देवी, रोहित कुमार, धर्मेंद्र शुक्ला, अरविंद पुरी, इरफान खान और भारत बघेल को बतौर इंजन और सतेंद्र सिंग को बोगी बताते हुए आरोपी बनाया गया था। सीबीआई को जांच में इन सातों आरोपियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले, क्योंकि ये इन लोगों ने फॉर्म तो भरे थे लेकिन वे परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए।
सीबीआई की जांच में मोनिका सेठ का मामला बेहद रोचक निकला। मोनिका के मकान का पता, फोन नंबर, ईमेल आईडी और आवेदन फॉर्म सहित अन्य सभी जानकारियां सही पाई गईं। उसके नंबर भी आगे, पीछे, दाएं और बाएं में बैठे परीक्षार्थियों से भी कम हैं। इसके बाद भी एसटीएफ ने मोनिका को बोगी बताकर आरोपी बना दिया था।
एसटीएफ ने अमित निमावत, बालेंद्र राजपूत और सुनीता सागर को बतौर दलाल आरोपी बनाया था। सीबीआई को जांच में इन तीनों लोगों से जुड़ा कोई भी आवेदक या आरोपी नहीं मिला। कोई ऐसा साक्ष्य भी नहीं मिला जिससे यह साबित किया जा सके कि उक्त तीनों ने पीएमटी परीक्षा में दलाली की है।
एसटीएफ ने 12 ऐसे लोगों को भी क्लीनचिट दी है, जिनके खिलाफ एसटीएफ के पास सबूत तो थे लेकिन वे इतने पुख्ता नहीं थे कि कोर्ट में जिरह के दौरान टिक पाते। इन लोगों में बदन सिंग यादव, गोपाल सिंग, नरेंद्र कौशिक, ठाकुर प्रसाद, जीवन लाल कुशराम, देवाराम, प्रकाश सिंग दापकरा, छोटेलाल जाटव, भूप सिंह सुमन, जीएस सुमन, बाबू लाल चौपड़ा, चीमा चौधरी शामिल हैं। वहीं जांच के दौरान मौत होने के कारण चंद्र सिंग, शैलेंद्र सिंग, ब्रजेश गर्ग और भारत सिंह सोलंकी को आरोपी नहीं बनाया गया।