शुरू होने जा रही भारत में फुटबॉल की सबसे बड़ी लीग शुक्रवार से

देश में पहली बार आयोजित हुए फीफा अंडर-17 विश्व कप से पैदा हुए उत्साह को भुनाने की बारी अब इंडियन सुपर लीग (आइएसएल) के चौथे संस्करण पर होगी। भारत में फुटबॉल की सबसे बड़ी लीग शुक्रवार से शुरू होने जा रही है।
टूर्नामेंट का उद्घाटन मुकाबला दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में केरला ब्लास्टर्स एफसी और एटलेटिको डि कोलकाता (एटीके) के बीच खेला जाएगा। इस लीग के विजेता को एएफसी कप में सीधे प्रवेश मिलेगा, जिसे एशिया में वही दर्जा हासिल है, जो यूरोप में यूरोपा लीग को है।
इस साल दो नई टीमें, टाटा ग्रुप की जमशेदपुर एफसी और बेहद पेशेवर बेंगलुरू एफसी लीग में पदार्पण कर रही हैं। आइएसएल को एशियाई फुटबॉल परिसंघ से मान्यता मिल चुकी है। जाहिर है, इसके बाद बेंगलुरु एफसी का इसमें शामिल होना तार्किक कदम माना जाएगा।
लीग में इस बार एक बदलाव और हुआ, जिसके मुताबिक अब टीमों के लिए अलेसांद्रो डेल पिएरो, मार्को मेटराजी और रॉबर्टो कार्लोस जैसे विश्व कप विजेता स्टार खिलाडियों से करार करना अनिवार्य नहीं रह गया है। इसके बदले अब देश के युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। अब किसी भी मैच में मैदान पर एक समय में कम से कम छह भारतीय खिलाड़ी होना अनिवार्य होगा।
चेन्नइयन एफसी के कोच जॉन ग्रेगरी ने कहा कि आइएसएल के चौथे सत्र से पहले पूर्व अभ्यास सत्र अच्छा रहा है और उनकी टीम का पहला लक्ष्य इसके प्लेऑफ में जगह बनाना है। उनकी टीम का पहला मुकाबला 19 नवंबर को एफसी गोवा से है।
पिछले साल सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली मुंबई एफसी चौथे संस्करण में दम भरने को तैयार है। टीम के कोच अलेक्सांद्र गुईमारेस का मानना है कि उनकी टीम में दो शानदार गोलकीपर हैं। मुंबई एफसी का पहला मुकाबला 19 नवंबर को बेंगलुरु एफसी से होगा।

देश की बेटियां बार्डर की सुरक्षा में अग्रिम पक्तिं में

आज के समय में लड़कियां प्रत्येक क्षेत्र में नाम रोशन कर रही हैं। जहां पहली बार भारतीय वायु सेना ने महिलाओं को फाइटर पॉयलट के रुप में कमीशन प्रदान की, वहीं दूसरी तरफ देश की बेटियां बार्डर की सुरक्षा में अग्रिम पक्तिं में खड़ी हैं।
लेकिन उनकी यह उड़ान वहीं नहीं रुकी है। महाराष्ट्र सरकार ने प्रदेश की फायर ब्रिगेड में पहली बार बड़ी संख्या में महिलाओं की भर्ती की है।
जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार की फायर ब्रिगेड में 97 महिला फायर फाइटर्स को नियुक्ति की गई है। इससे पहले प्रदेश सरकार की फायर ब्रिगेड में केवल 18 लड़कियां ही शामिल थीं। नई भर्ती हुई महिलाओं में अधिकतर प्रदेश के दूर-दराज क्षेत्रों की रहने वाली हैं।
सरकारी सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में महिलाओं की संख्या और बढ़ाई जायेगी। उन्होंने बताया कि नई भर्ती हुई फायर फाइटर्स को वडाला के रीजनल कमांड सेंटर में ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके बाद इन्हें प्रदेश के विभिन्न भागों में तैनाती दी जायेगी।

शहर के तीन प्रसिद्ध डॉक्टर डेंगू और चिकनगुनिया से गंवा चुके जान

डेंगू और चिकनगुनिया से शहर के तीन प्रसिद्ध डॉक्टर जान गंवा चुके हैं। इनमें से दो तो एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रिटायर प्रोफेसर थे। बावजूद इसके स्वास्थ्य विभाग कह रहा है कि शहर में डेंगू और चिकनगुनिया से कोई मौत नहीं हुई।
जब तक मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब पुष्टि नहीं करती, तब तक विभाग मानता ही नहीं कि बीमारी हुई है। हजारों लोग अब भी इन बीमारियों से जूझ रहे हैं लेकिन विभाग के आंकड़े 121 की ही पुष्टि कर रहे हैं। आशंका इस बात की भी है कि ये बीमारियां अब तक दर्जनों लोगों को लील चुकी हैं।
डेंगू से पीड़ित वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. ओपी बाजपेई की हाल ही में डेंगू से मौत हुई है। इसके पहले डॉ. एलएस शर्मा भी इसी बीमारी से जान गवा चुके हैं। इसी तरह डॉ. एलएस भटनागर की चिकनगुनिया से मौत हुई थी। तीनों ही डॉक्टरों की बीमारियों से मौत की आईएमए और डॉक्टर पुष्टि कर रहे हैं, बावजूद स्वास्थ्य विभाग बीमारियों से कोई मौत नहीं होने की बात कह रहा है।
शहर के हर दूसरे घर में बुखार और जोड़ों के दर्द के मरीज हैं। उन्हें हफ्तों दर्द से निजात नहीं मिल रही। विभाग ने अब तक सिर्फ 2017 मरीजों के सैंपल जांच के लिए मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब भेजे हैं। इनमें से 121 में डेंगू और 27 में चिकनगुनिया की पुष्टि हुई है। निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में इलाज कराने वाले हजारों लोग निजी लैबों से जांच करवा रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इनकी रिपोर्ट को मान्यता नहीं देता।
डेंगू के लिए दो तरह की जांच होती है। पहला रैपिड टेस्ट और दूसरा मैक अलाइजा टेस्ट। दोनों ही जांचों पर 50 से 300 रुपए तक खर्च आता है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ये जांचें लगभग मुफ्त होती हैं लेकिन दिक्कत यह है कि हर संदिग्ध मरीज का ब्लड सैंपल यहां नहीं भेजा जा सकता। यही वजह है कि पूरा शहर भले ही बीमारी से परेशान हो, सरकारी आंकड़ा 121 पर ही अटका हुआ है। आरोप यह भी है कि शासन स्तर पर बीमारी की गंभीरता कम आंकने के लिए जानबूझकर ऐसा किया जा रहा है। शासन क्षेत्रवार निजी लैब को जांच के लिए अधिकृत कर देता तो वास्तविक आंकड़े सामने लाए जा सकते थे।
स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों से मरीजों के ब्लड सैंपल बुलवाए हैं जबकि ज्यादातर मरीज क्लिनिक में इलाज करवा रहे हैं। डेंगू और चिकनगुनिया दोनों के मरीज को भर्ती होने की अनिवार्यता नहीं रहती। ऐसे में शासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जब तक एमजीएम मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब बीमारी की पुष्टि नहीं करती, हम बीमारी नहीं मानते। निजी लैबों की जांच रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेने का कोई सिस्टम नहीं है। सालों से व्यवस्था इसी तरह चल रही है। अब तक शहर में डेंगू और चिकनगुनिया से कोई मौत नहीं हुई।
डेंगू और चिकनगुनिया से तीन डॉक्टरों की मौत हुई है। शहर में हजारों मरीज हैं लेकिन विभाग इसे मान नहीं रहा। हजारों मरीज रिकॉर्ड पर नहीं आ पा रहे। क्लिनिकों के बाहर मरीजों की कतार लग रही है। एमवायएच की ओपीडी में सामान्य दिनों के मुकाबले तीन गुना मरीज आ रहे हैं।